• Post published:April 28, 2020
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लॉकडाउन में एक छत के नीचे !

           लॉकडाउन में बालसमंद [रवि घोड़ेला] सुबह सवेरे एक बड़े से बर्तन में चाय उबल रही थी,  घर के हर कोने से अलग-अलग आवाज आ रही थी,  कोई पशुओं को चारा डाल रहा था तो कोई खुली हवा में योग प्रणायाम कर रहा था।

कुछ लड़कियां अपनी दादी के पास बैठ दूध मंथने का तरीका सीख रही थीं तो कोई अपने दादा से पुराने किस्‍से सुनने में व्‍यस्‍त था। ये नजारा था सीसवाला गांव के जांगड़ा परिवार का। जहां एक ही छत के नीचे 4 पीढ़ियों के 44 लोग एक साथ रहते हैं।(लॉकडाउन )

हालांकि ये परिवार लॉकडाउन से पहले भी यूं ही रहता था, मगर सभी लोग एक साथ एकत्रित नहीं हो पाते थे, बच्‍चे स्‍कूल चले जाते थे तो बड़े काम पर अब इस परिवार की जीवनशैली में हल्का सा परिवर्तन आया है। इनका कब बातों और काम में दिन गुजर जाता है पता ही नहीं चलता क्योंकि जो सदस्य अपने काम निकल जाते थे वो भी घर पर ही रहते हैं।

शाम को जब सांझे चूल्हे पर खाना पकता है तो बच्चे कतार बनाकर बैठ जाते है भले ही नंबर देरी से आए मगर न नाराजगी है न गुस्सा क्योंकि आपस में प्यार ही इतना है। आधुनिक तौर में सिमट रहे परिवारों के लिए चार पीढ़ियों का परिवार क्षेत्र के लिए मिसाल बन गया है। परिवार में सबसे बुजुर्ग 85 वर्षीय भूतपूर्व सरपंच रामजस जांगड़ा अपनी चार पीढ़ी के साथ रह रहे हैं।लॉकडाउन 

लॉकडाउन में एक छत के नीचे रह रहे 4 पीढि़यों के 44 सदस्‍य, हर वक्‍त शादी जैसी रौनकघर के सभी सदस्य फिजिकल डिस्टेंसिंग के साथ कोरोना से बचाव का पूरी तरह पालन कर रहे हैं। यह परिवार उन लोगों के लिए सबक है जो लॉकडाउन का उल्लंघन कर बाजार में घूमकर स्वयं व परिवार की जान खतरे में डाल रहे हैं। संयुक्त परिवार की परंपरा को जांगड़ा परिवार ने सार्थक किया है। घर में बंटवारा आज तक नहीं हुआ है।(लॉकडाउन )

भूतपूर्व सरपंच रामजस जांगड़ा के छह बेटों ने कहा कि जब तक हम जिंदा रहेंगे कभी अलग नहीं होंगे। घर में डिस्टेंसिंग, सैनिटाइजर व साबुन से बार-बार हाथ धोने तथा मास्क लगाकर रखने के सभी जागरूक रहते हैं।

बुजुर्ग रामजस और शांति देवी बताती है कि सुबह-शाम भजन कीर्तन के साथ अपनी पीढ़ियों को उनके समय के घटनाक्रम के साथ पुराने किस्से सुनाते है। पुरुष किचन में रोज नए पकवान बनाना सिख रहे हैं। बच्चे लूडो, कैरम खेल रहे हैं। तो बड़े बुजुर्ग टीवी रामायण और महाभारत देखने के साथ पुराने समय की सुनहरी यादों को साझा कर रहे हैं।

दो बार घातक बिमारियों ने ली कई जान

               भूतपूर्व सरपंच रामजस जांगड़ा बताते है कि देशी वर्ष के अनुसार सन 75 में कार्तिक वाली बीमारी आई थी उस समय महिलाओ की मौत ज्यादा हुई। एक का संस्कार करके आते तब दूसरी की मौत हो जाती। इसके बाद अंग्रेजी साल के अनुसार 1940 में हैजा की बीमारी से भी काफी लोगों की मृत्यु हुई थी। इससे पहले मैंने अपनी जिंदगी में ऐसी बीमारी नहीं देखी जिसका अस्पताल में भी इलाज नहीं हो।

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