कवित्री महादेवी वर्मा द्वारा राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की जीवन पर कुछ लाइनें!

देश के प्रथम राष्ट्रपति डा राजेंद्र प्रसाद जी का जीवन कितना सादा था इस बारे में महान कवियत्री महादेवी वर्मा जी ने अपनी आत्मकथा में एक प्रसंग लिखा है कि एक बार एक समारोह में उनकी मुलाकात डॉ राजेन्द्र प्रसाद और उनकी धर्मपत्नी जी से हुई वो लोग मुझसे बहुत आत्मियता से मिले मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं उनकी परिवार की ही सदस्य हूं और उन्होंने मुझे कहा कि आप जब भी दिल्ली आए तो हमारे निवास पर ही रूकें, राष्ट्रपति जी की पत्नी ने काफी सकुचाते हुए विन्रम निवेदन किया कि आपके यहां गेहूं फटकने वाले छाज अच्छे मिलते हैं अगर संभव हो तो लेते आना क्योंकि मेरे पास जो छाज है वह टुटने वाला है।(राष्ट्रपति जी की पत्नी स्वयं गेहूं साफ करके उसे पिसवा कर अपना और राष्ट्रपति जी का भोजन स्वयं पकाती थी।) महादेवी वर्मा आगे लिखती हैं कि एक बार मेरा दिल्ली जाने का प्रोग्राम बना तो मुझे छाज की बात याद थी इसलिए मैंने बाजार से दो छाज खरीद लिए। ट्रेन से रात्रि सफर कर सुबह पुरानी दिल्ली स्टेशन पर उतर कर वहां से राष्ट्रपति भवन के लिए तांगा करके छाज के साथ राष्ट्रपति भवन पहुंच गई, अन्दर अपने पहुंचने का संदेश भिजवाया कुछ समय उपरांत स्वयं राष्ट्रपति जी एवं उनकी धर्मपत्नी बाहर मेरी अगवानी के लिए पहुंच गए यह मेरे जीवन का अविस्मरणीय पल थे जिसमें स्वयं राष्ट्रपति जी मेरे लिए बाहर आये दोनों लोग मुझसे मिलकर बहुत खुश हुएं, राष्ट्रपति जी की पत्नी की नजर जब छाज पर पड़ी तो वह अत्यंत प्रसन्नता के साथ बोली अरे तुमने हमारी इच्छा को याद रखा और उन्होंने एक अबोध बालक की तरह दोनों छाज अपने हाथों में ले लिए और स्वयं उन्हें लेकर अन्दर जाने लगी मेरे सामान को जो नौकर ले जा रहा था बोला कि इन छाज को भी मैं ले चलता हूं तो उन्होंने मना कर दिया नहीं वह स्वयं लेकर चलेंगी। उस समय मुझे महसूस हुआ कि हम कितने धन्य लोग हैं जिनके देश के राष्ट्रपति और उनकी धर्मपत्नी इतने सरल और सहज है। राष्ट्रपति भवन के अन्दर पहुंच कर मुझे अतिथि कक्ष में ठहरने की व्यवस्था की गई तथा मुझसे पूछा कि आप दोपहर के भोजन में क्या खाना पसंद करेंगी मैंने उनसे कहा कि जो आप लोग खायेंगे मैं भी वहीं का लूंगी तब राष्ट्रपति जी की पत्नी ने बताया कि हमारा तो आज उपवास है इसलिए आप जो खाना पसंद करेंगी वो मैं बना दूंगी। महादेवी वर्मा लिखती हैं कि मैं सोचने लगी कि राष्ट्रपति जी के यहां तो उपवास में भी अच्छे अच्छे पकवान बनाए जाते होंगे तो मैं भी वहीं खाऊंगी। मैंने उनसे कहा कि मैं भी वहीं खा लूंगी जो आप लोग उपवास में खायेंगे, तब उन्होंने कहा कि ठीक है। मैं भी स्नान आदि से निवृत होकर बाहर बड़े भव्यशाली कक्ष में आ गई और कक्ष की भव्यता को निहारती रही इतनी देर में डाइनिंग टेबल पर भोजन लग गया और राष्ट्रपति महोदय भी आ गये हम तीनों डाइनिंग टेबल पर भोजन के लिए बैठ गये राष्ट्रपति जी की पत्नी ने भोजन परोसा तो मैंने देखा कि उपवास के भोजन में केवल उबले आलू और दही है अब मुझे अन्दर ही अन्दर अपने आप को कोस रही थी कि मैंने क्या सोचा था लेकिन क्या मिला लेकिन अब कुछ नहीं किया जा सकता है इसलिए प्रेम पूर्वक इसी भोजन को ग्रहण करना चाहिए जिसे इस महान देश के महान राष्ट्रपति जी की पत्नी ने इतने प्रेम से बनाया और परोसा है और मैं सच कहती हूं कि उस दिन उस भोजन में जो अपनेपन का अहसास और प्रेम का स्वाद चखा वह मुझे जीवन भर याद रहेगा। इस महान देश के महान राष्ट्रपति को उनकी सादगी, सरलता और उनका अपनापन इतिहास में एक अविस्मरणीय व्यक्ति के रूप में पहचाना जायेगा। ऐसे महापुरुष को मेरा कोटि कोटि नमन।

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